षट्तिला एकादशी व्रत की पुराणोक्त विधि व व्रत कथा।

@vedic Dharma Vigyan

षट्तिला एकादशी व्रत की पुराणोक्त विधि व व्रत कथा।


आलेख:- ज्योतिषाचार्य पं० शुभ दर्शन

षट्तिला एकादशी
28 जनवरी 2022 (शुक्रवार)

माघ मास के कृष्णपक्ष की एकादशी को षट्तिला एकादशी के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि यह एकादशी मनुष्य के जन्म जन्मान्तरों के पाप-दोषों को नष्ट करने वाली है, तथा मनुष्यों के पुण्यों को उदय करने वाली है। और जब पुण्यों का उदय होगा तो स्वतः हीं भाग्य, धन और सभी सांसारिक सुखों की प्राप्ति होगी।
कार्तिकादि मास के तरह हीं माघ मास का भी विशेष महत्त्व है, क्योंकि कहा जाता है कि इस माह में स्वर्ग से देवतागण भी त्रीवेणी में स्नान करते हैं। और इस माह में आने वाली एकादशी भी अत्यंत पुण्यदायी और कल्याणकारी मानी गई है।

♦️ षट्तिला एकादशी व्रत करने की पुराणोक्त विधि:-

पुराणों में एकादशी की विधि का वर्णन इस प्रकार है-
दशमी तिथि के दिन एक समय भोजन करना चाहिए। भोजन में प्याज़-लहसुन और मसूर का दाल का परित्याग करना चाहिए।( माघमास में मूली खाना भी वर्जित है)। शुद्ध सात्विक भोजन हीं ग्रहण करना चाहिए। दशमी से द्वादशी पर्यन्त ब्रह्मचर्यव्रत धारण करना चाहिए। 
क्षैरकर्म नहीं करना चाहिए।
एकादशी के दिन भगवान् नारायण का विधिवत पूजन व संकल्प कर व्रत करे और किसी ब्राह्मण के श्रीमुख से उस एकादशी की पावन कथा को श्रवण करें। ब्राह्मणों को अन्न व धन का दान करे। यथा संभव प्रभु के नाम का सुमिरन करें। और एकादशी की रात्रि को जागरण करते हुए, भजन सुमिरन करना चाहिए।
पुनः द्वादशी को ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा से संतुष्ट कर व्रत का पारण करें, और द्वादशी को भी एक समय हीं भोजन करें।
व्रत के दौरान असत्यवादन, क्रोध और व्यर्थ का वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।
जो एकादशी का व्रत न भी करते हों उन्हें भी इस दिन चावल नहीं खाना चाहिए। द्वादशी के दिन चावल ग्रहण करना चाहिए।

षट्तिला एकादशी के दिन तिल का विशेष महत्त्व है, क्योंकि आज के हीं दिन भगवान् नारायण से तिल उत्पन्न हुआ था। इस दिन तिल का दान करने से स्वर्ण दान का फल प्राप्त होता है।
शास्त्रों के अनुसार इस दिन छः प्रकार से तिल का उपभोग अवश्य करना चाहिए।

१. तिल से उबटन लगाना चाहिए।
(सिर्फ षट्तिला एकादशी के दिन हीं तिल से उबटन का विधान है, अन्य एकादशी के दिन उबटन नहीं करना चाहिए)।

२. बाल्टी में तिल डालकर स्नान करना चाहिए।
३. भगवान् नारायण का तिल से पूजन करना चाहिए और भोग में तिल से बने मिष्ठान व तिलकुट अर्पण करना चाहिए।

४. हवन/यज्ञ में तिल की आहुति देना चाहिए।
५. तिल से तर्पण करना चाहिए।
६. ब्राह्मणों को तिल से बने सामग्री विशेष रुप से दान करना चाहिए।

♦️षट्तिला एकादशी की कथा:-♦️
एक समय की बात है। डालभ्य ऋषि ने पुलस्त्य ऋषि से प्रश्न किया, कि हे महराज, पृथ्वीलोक में मनुष्य नाना प्रकार के पाप करते हैं, पराये धन की चोरी तथा काम, मद और ईर्ष्या व दुर्वयसनों में फँसे है, फिर भी उनको नर्क प्राप्त नहीं होता है, इसका क्या कारण है?
वे कौन सा दान या कौन पुण्य करते हैं, जिससे उनके पाप नष्ट हो जाते हैं?
यह सब कृपा करने मुझसे कहें।
ऋषि पुलस्त्य ने कहा कि, आपने बहुत हीं उत्तम प्रश्न किया है, इससे संसार का कल्याण होगा। 
पुलस्त्य ऋषि ने कहा कि एक बार देवर्षि नारद ने यही प्रश्न भगवान् विष्णु से पूछा था। तब भगवान् ने जिस उपाय को बताया था, वह मैं आपसे कहता हूँ।
पुराने समय की बात है। कुरुक्षेत्र में एक धर्मात्मा बुढ़िया रहती थी। वह अपना अधिकाधिक समय व्रत उपवास में हीं व्यतीत करती थी, किन्तु कभी किसी ब्राह्मणों को दान नहीं किया था।
एक दिन स्वयं भगवान विष्णु ब्राह्मण का वेश धारण कर उस वृद्धा के द्वार पर भिक्षा मांगने पहुंचे। उन्होंने उस वृद्धा से भिक्षा मांगा तब उस वृद्धा ने चिढ़कर एक ईंट उनकी झोली में डाल दिया, और कहा कि इसे खा लेना।
ब्राह्मण वेशधारी भगवान् नारायण उस ईंट के ढेले को लेकर के विष्णु लोग चले आए।
कुछ समय बाद उस बुढ़िया की मृत्यु हो गई, और व्रत के प्रभाव से उस बुढ़िया को सीधे स्वर्ग की प्राप्ति हुई। वहाँ सुंदर स्वर्ण युक्त महल था, जहाँ सब प्रकार के साधन थे, किन्तु खाने पीने की कोई सामग्री नहीं थी। भूख-प्यास से व्याकुल होकर वह बुढ़िया विष्णु भगवान के पास गई और बोली- हे भगवन्! मैंने सदा व्रत और उपवास करते हुए अपना जीवन बिताया है। सभी पुराणों की कथाएं सुनी, कठिन तप भी किया फिर भी मुझे यहां खाने पीने की चीजें क्यों नहीं मिल रही है?
भगवान् विष्णु बोले- जिन वस्तुओं का दान तुमने मृत्युलोक में किया है, वही यहाँ मिल सकता है। मैं स्वयं एक बार तुम्हारे घर पर भिक्षा मांगने आया था, तब तुमने मुझे ईंट का ढेला दिया था जिसके फलस्वरूप तुम्हें स्वर्ग में महल की प्राप्ति हुई। किंतु तुमने कभी अन्न का दान नहीं किया था। इसलिए यहां सभी साधन तुम्हें मिले किंतु भोजन व अन्न नहीं मिला है।
तब वह वृद्धा रोते हुए भगवान से क्षमा मांगा। और कहा- कि हे भगवान्! मुझे ऐसा उपाय बताएँ, जिससे मुझे यहां अन्न जल की प्राप्ति हो सके।
तब करुणा के सागर भगवान् ने दया करते हुए कहा कि तुम मृत्युलोक में जाकर षट्तिला एकादशी का व्रत करो। और ब्राह्मणों को अन्न, जल कुंभ और दक्षिणा से प्रसन्न करो। तब तुम्हें यहां पुनः आने पर अन्न जल की प्राप्ति हो सकेगी।
तब उस वृद्धा ने ऐसा हीं करते हुए एकादशी का व्रत और दान किया। फल स्वरूप उसे पुनः स्वर्ग में आने पर सभी प्रकार के सुखों व ना-ना प्रकार के पकवानों की प्राप्ति हुई।


आलेख:- ज्योतिषाचार्य पं० शुभ दर्शन

Previous Post Next Post