*✍️ आलेख:- आचार्य पं० शुभ दर्शन*
*♦️ रमजान (रामध्यान)-* यह नवाँ अरबी मास है संस्कृत के 'रामध्यान' शब्द का अपभ्रंश है। इसे रमजान्(जाद् से) तथा रमदान (दाल से) दोनो ही लिखते हैं। आधुनिक मिस्त्र की अरबी में इसे रमदान ही लिखने की रीति है। भाषा वैज्ञानिक आधार पर रमजान तथा रमदान शब्दों की व्युत्पत्ति निम्नानुसार है-
1-रामध्यान-रामझ्यान- रामझान- रमझान,- रमजान
2- रामध्यान- रामधान- रामदान- रमदान
जिस प्रकार भारत में बोली जाने वाली संस्कृत से पाली, प्राकृत, अपभ्रंश तथा आज की प्रान्तीय भाषाओं का विकास क्रमशः हुआ है, वैसा ही अरब भूभाग की प्राचीन प्राकृत से आधुनिक अरबी भाषा का विकास हुआ है।
इस महीने का नाम रामध्यान पड़ने का कारण यह है कि दीपमालिका के अवसर पर श्रीराम ने 14 वर्षों बाद राजगद्दी सम्भाली तो उन्होने देश-विदेश के राजाओं के लिए धर्मपालन एवं प्रजापालन को ठीक ढंग से करने हेतु अनुरोध पत्र भेजे थे। ये पत्र मार्गशीर्ष (अगहन) के महीने में पहुँचे थे, तब से अरब में यह मास रामध्यान ( राम की बात पर ध्यान देने का महीना) कहलाया |
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम द्वारा भेजे गये पत्रों की भाषा पद्मपुराण के अनुसार निम्न प्रकार की थी-
*भूयो भूयो भाविनो भूमिपाला: नत्वा नत्वा याचते रामचन्द्र:।*
*सामान्योSयं धर्मसेतुर्नराणां काले- काले पालनीयो भवद्भि:॥*
अर्थात् हे पृथ्वी के विभिन्न भागों के शासकगणों! आप सबसे विनम्रतापूर्वक अनुरोध है कि आप लोग धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करें, जिससे प्रजा भी धर्मशील रहे।
*वाताभ्रविभ्रममिदं वसुधाधिपत्यमापातमात्रमधुरा विषयोपभोगा।*
*प्राणास्तृणाग्रजलविन्दुसमा नराणां काले- काले पालनीयो भवद्भि:॥*
अर्थात् हे शासकों! यह राजसत्ता ऐसी क्षणभंगुर है, जैसे कि वायु से भागने वाले मेघ और संसार के सुख-विषयभोग केवल तुरन्त ही मीठे होते हैं। पश्चात् उनका फल क्लेशप्रद ही रहता है। मनुष्यों के प्राण तो ऐसे होते हैं, जैसे घास की नोंक पर जल की बूंद चाहे जब नष्ट हो जाती है। इसलिए आप धर्म का पालन करें और करावें।
इस महीने को गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने भी अत्यंत पवित्र कहा है। वे कहते हैं- मासानां मार्गशीर्षोSहम्। अस्तु; यह मास अत्यन्त पवित्र मास होता है। राम शब्द 'र' वर्ण अग्निबीज है; अत: निराकार राम का ध्यान करने ये पाप जल जाते हैं। तुलसीदास जी ने इसीलिए कहा है-
*बन्दउं नाम राम रघुबर को।*
*हेतु कृशानु भानु हिमकर को।।*
इस धारणा की पुष्टि अरबी शब्दकोशों में रमजान के अर्थ से भी होती है। लुगातेहीरा के अनुसार-
'रमजान (अरबी रे. मीम्. जाद) - संगे गरम-अरबी नवें महीने का नाम। चूँकि इस महीने में रोजा रखने की वजह से गुनाह जल जाते हैं लिहाजा नाम रखा गया।'
इस विवरण से उक्त भारतीय सिद्धान्त की पुष्टि होती है। इस मास की पवित्रता सारे संसार में इस्लाम के पूर्व से ही मान्य थी। श्रीमद्भागवत के अनुसार भी इसी मार्गशीर्ष मास में गोपिकायें कात्यायनी देवी की पूजा करती थी।
इस्लाम में दिन का व्यवहार प्रथम चन्द्र द्वितीय चन्द्र इत्यादि रूप से अथवा तारीख़ के नाम से किया जाता है। तिथियों के न्यूनाधिक होने पर मास के दिन न्यूनाधिक होते हैं। इनका वर्ष 354 दिन का होता है। यह वर्ष चान्द्र दिन का होने के कारण हर तीसरे वर्ष इनकी ईद हमारे मास के एक महीने पहले होता है। इस तरह 32 व 33 वर्ष पर इनके सन् का एक अंक बढ़ता जाता है। इस कारण से अब ये इस्लामी महीना कलेण्डर में किसी भी ऋतु में पड़ने लगा है।
रोजा- इस्लाम में रमजान के पवित्र मास में रोजा रखना फर्ज( कर्तव्य) है। साथ ही यह महीना शक्ति का मास होता है। इसमें लड़ना-झगड़ना वर्जित है। प्रात:काल सूर्योदय के पूर्व ही रोजेदार सहरी कर लेते हैं। इसके पश्चात् रात्रि में इफ्तार किया जाता है।
रमजान के मुख्य पर्व- यूँ तो रमजान का पूरा महीना ही पवित्र है; परन्तु उसमें कुछ विशेष पर्व दिन निम्नांकित हैं-
3 तारीख़, फातिमा की वफात्- इस दिन फातिमा जुहरा का देहान्त हुआ था। इसी महीने की 15 वीं तारीख़ हजरत आयशा की वफात (पुण्यतिथि) पड़ती है।
17 वीं तारीख़ को बदर की लड़ाई ( जंगे बद्र) की स्मृति करते हैं।
जमातुल विदा- रमजान के महीने की २८वीं तारीख़ को जमातुल विदा का पर्व होता है।
ईद मुबारक- यह पर्व रमजान महीने की समाप्ति पर होता है। ईद का अर्थ पूजा है। जब रमजान की अन्तिम तारीख़ खत्म होकर सन्ध्या समय शव्वाल मास की पहली तारीख़ शुरू होती है, तब ईद का आरम्भ होता है और दूसरे दिन ईद मनाते हैं।
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