॰❀꧁पर्व विशेष:-꧂❀॰
| image of Shree Radha Rani Janmsthal, Rawal,Mathura |
श्री राधा जन्माष्टमी महामहोत्सव
विशेष:-
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दिनांक:- 14 सितंबर 2021 (मंगलवार)
आलेख:- आचार्य पं० शुभ दर्शन
वृषभानु नन्दिनी श्री राधा की महिमा अपरम्पार है। वेदों, उपनिषदों, पुराणों में उन्हें सच्चिदानन्दमयी, पूर्ण शक्ति स्वरूपिणी, परमानन्दस्वरूपिणी कह कर सम्बोधित किया गया है।
आज के समय में बहुत से मिथक और यथार्थता से रहित अवधारणाओं, और तरह तरह के टीवी सीरियलों के कारण राधा तत्त्व की वास्तविक महिमा और उनकी दैवीय लीला को सांसारिक समझने की भूल करते हैं।
इन अनैतिक अवधारणाओं का खण्डन करने और वास्तविकता से अवगत कराने का प्रयास मैंने अपने इस शास्त्रीय प्रामाणोक्त आलेख के माध्यम से किया है।
तो आइए जानते हैं.....
➤ सर्वप्रथम गोलोक में श्री राधारानी का आविर्भाव:-
भगवान् के उस साश्वत् नाम, साश्वत् रूप, दिव्य लीलाओं और धाम में कोई अन्तर नहीं है। प्रकृति के ऊपर उस उस गुणातीत गोलोकधाम में श्रीराधा रानी का आविर्भाव कैसे हुआ इसका प्रमाण ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णित है -
आविर्वभूव कन्यैका
कृष्णस्य वाम पार्श्वतः।
धावित्वा पुष्पमानीय
ददाबधर्य प्रभोः पदे॥
रासे संभूय गोलोके
सा दधाव हरे पुरः।
तेन राधा समाख्याता
पुराविद् भिर्द्विजोत्तम॥
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खण्ड, ५, २५-३९)
अर्थात् स्वयं श्रीकृष्ण के वाम पार्श्व से एक कन्या का आविर्भाव हुआ, उसने दौड़ कर पुष्प हाँथ में लेकर प्रभु के श्रीचरणों में अर्घ्य प्रदान किया, और गोलोक के रासमण्डल में आविर्भूत हो कर श्रीकृष्ण के सम्मुख धावित हुई अतः हे द्विजोत्तम, इसी कारण तत्त्वदर्शी, तत्त्व को जाननेवाले उन्हें श्रीराधा नाम से पुकारते हैं।
➤ भूलोक में श्रीराधा रानी का अवतरण
पुराणों में वर्णित एक कथा के अनुसार विरजा नाम वाली गोपी को लेकर भगवान् श्रीकृष्ण गोलोक धाम के नित्य रासमण्डल से अंतर्धान हो गए। श्री राधा गोपवृन्दों को साथ लेकर उसी स्थान पर आईं, जहाँ भगवान श्री कृष्ण विरजा के साथ केलि-पारायण थे। उस समय सुदामा नामक गोप द्वारपाल के सेवा में नियुक्त थे। जब श्रीराधा रानी उस स्थान में प्रवेश को उद्यत हुईं जब सुदामा गोप ने उन्हें वहाँ जाने रोक दिया। तब श्रीराधा रानी ने सुदामा गोप को भूलोक पर असुर होने का श्राप दे दिया। फलस्वरूप सुदामा गोप शंखचुड़ दानव हुए। उधर सुदामा गोप ने कहा कि मैं तो भगवान् श्री कृष्ण की आज्ञानुसार सेवारत था, और कर्तव्यनिष्ठ होकर अपने सेवा कार्य को कर रहा था, किंतु आपने बिना विचार किए मुझे श्राप दे दिया। मुझे इस बात का कोई दुःख नहीं है कि मुझे असुर योनि में जाना होगा। मैं बस इसलिए संतप्त हुँ कि मुझे मेरे प्राणपति, मेरे प्रभु श्रीकृष्ण का वियोग सहना पड़ेगा। इस समय मेरे भीतर चल रहे उस वियोग का आपको तनिक भी अनुभव नहीं है। अतः हे गोलोकेश्वरी आपको भी मैं श्राप देता हूं कि द्वापर के अंत में जब भगवान् श्रीकृष्ण धरा भूमि पर भक्तों को आनंदित करने और दुष्टों का संहार करने के लिए अवतरित होंगे, तब आप भी अपने सखियों सहित गोप कन्या के रूप में अवतरित होंगी और श्रीकृष्ण से विलग रहेंगी और श्री कृष्ण के वियोग का सामना करना पड़ेगा।
(क्रमशः........)
नोट:- श्रीराधा रानी के दिव्य लीलाओं का पूरा वर्णन एक बार में प्रस्तुत पाना असंभव है। अतः इस क्रम को आगे अलग-अलग भागों में विभाजित कर आप सभी के सामने प्रस्तुत किया जाएगा।